तू दरिया भी किनारा भी

🌿शुभप्रभात🌿

🌿सादर नमन पाठकों🌿

छवि श्रेय: साधक

तु  दरिया  भी   किनारा  भी,
तु  मसला   भी  सहारा  भी।

न कर शोख़ी ऐ जान-ए-जाँ,
जो   मेरा   है   तुम्हारा   भी।

तुम्ही  दिन  का  उजाला हो,
तुम्ही  चांद-ओ-सितारा  भी।

शबों  का   मुहतशम  मौसम,
चश्म-ए-सुब्ह का नज़ारा भी।

न  हो   रुसवा   मिरे   रौशन,
कि  दिल   टूटा   हमारा  भी।

ख़फ़ा  हो  के  गये  जब  दूर,
बहुत   ढूढ़ा     पुकारा    भी।

°साधक°

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🌿ओ३म्🌿

🙏जय माँ शारदे🙏

राम भजो श्याम भजो

🌿प्रिय काव्य पाठकों को सादर नमन🌿

🙏आप सभी पाठकों को कोटिशः साधुवाद🙏

छवि श्रेय: साधक

धनकाम्य नहीं हरि नाम लखो।
इस जीवन में  बस राम लखो।।
इह  छोड़  वृथा सब छोर यहाँ।
मन  मैल  भरे  सब  चोर यहाँ।।

इक  नाम भजो  नित  राम  भजो।
हरि स्मर्ण सँजो  नित श्याम भजो।।
मन  मंदिर  से  सब  काम  त्यजो।
अजि राम भजो अजि श्याम भजो।

पग  मोड़ सदा  हरि ओर लगो।
भ्रम छोड़ सदा प्रभु ओर भगो।।
वह  बैठ  वहाँ  सब  देख  रहा।
कउ  दुष्ट  भया  कउ नेक रहा।।

जग  जीवन  का  नित  ताप  हरो।
व्रण  क्लेश  व्यथा  सब  पाप हरो।।
प्रभु  चिंतन  में निज  नाम  त्यजो।
अजि राम भजो अजि श्याम भजो।

°साधक°

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🌿ओ३म्🌿

🙏जय माँ शारदे🙏

जय श्री राम

🌿आप सभी काव्य प्रेमियों को स्नेहिल नमन🌿

छवि श्रेय: साधक

तिलोक प्रभु निज धाम पधारो,
संकट में जग संकट तारो।
बहु दिन बीते बहु दिन काटे,
अब इक पल नहि काटे जाते।।

प्रभु तुम बिन अवधपुरी कोरी,
कष्ट क्लेश विपत्ति चहुँओरी।
सँग सिया लक्ष्मण गृह आओ,
संकट के छण आज मिटाओ।।

हनुमत भी हैं आस लगाये,
प्रभु मोरे अब तक नहि आये।
राम सिया बिन धीरज खोते,
प्रभु सुमिरन में ढाढस बोते।।

धाम पधारो हे रघुराई!,
देखो अवधपुरी मधुराई।
प्रफुल्ल हो उठी सरयु धारा,
पग-पग हर तट लागे न्यारा।

जय हो जय हो प्रभु रामाया,
कष्ट हरो अब तारो काया।
कृपा करो प्रभु तुम अति भारी,
सुखी रहें घट-घट के प्राणी।।

°साधक°

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🌿ओ३म्🌿

🙏जय माँ शारदे🙏

पितृपक्ष दोहे

🌿सभी को सादर नमन🌿

🌿जय माँ वीणापाणि🌿

प्रिय साथियों !
जैसा कि आप सभी को विदित है कि कल अपने सनातन धर्म द्वारा निर्धारित पितृपक्ष का समापन हो गया और गत 14 दिनों से मैं इस पर कुछ नहीं लिख पाया। इसलिए कुछ पंक्तियाँ सादर प्रस्तुत हैंं।

छवि श्रेय: साधक

क्वार मास के मध्य ते, कृष्ण पक्ष जब आत।
श्राद्ध पक्ष की तर्पणा, पितरों को दे जात।।

शुचि सावन ते सब पितर, आते मरण निवास।
श्राद्ध ग्रहण कर पुत्र से, हिय पाते सुरवास।।

वसु रुद्र आदित्य यहाँ, हैं तीन श्राद्ध देव।
तृप्त अगर हों ये सभी, प्रमुक्ति अवश्यमेव।।

श्राद्ध करें यदि नेह से, घर-दर शुचि हो जात।
पितृ संदभ नर प्रतिफले, नित्य आशीष पात।।

°साधक°

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🌿ओ३म्🌿

🙏जय माँ शारदे🙏

शिव सबके अंतरयामी

🌿जय माँ शारदे🌿

🌿सभी गुणीजनों को सादर नमन🌿

छवि श्रेय: साधक

शिव सबके हैं आत्म अधीश्वर,  शिव सबके अंतरयामी,
ब्रह्मकोश शिव, शिव परात्पर, अष्टसिद्धि के शिव स्वामी।
आत्मज्ञान शिव, मुक्ति धाम शिव, शिव हैं सर्वश्रेष्ठ दाता,
एकमेव शिव, आदिदेव शिव, शिव ही केवल जग त्राता।।

°साधक°

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🌿ओ३म्🌿

🌿जय माँ शारदे🌿

एक पैजनी ला दो

🌿प्रिय साहित्य अनुरागियों सादर नमन🌿

आप सभी पाठकों को कोटिशः साधुवाद । सभी के अविरल स्नेह से अति प्रसन्न हूँ और सृजन के माध्यम से हिंदी साहित्य संवर्धन और संरक्षण हेतु अनवरत प्रयासरत है। हालाँकि मेंरा प्रयास मात्र तिनके भर ही है। माँ शारदा सभी पर कृपा बनाये रखें। एक प्रयास सादर प्रस्तुत है।

बापु पैजनी बहुत लुभाये, एक पैजनी ला दो,
सँग उसके मोहक कँगने भी, जल्दी से मँगवा दो,
रंग  बिरंगी  नई  नवेली,  अंगवस्त्र  भी  चाहूँ,
और चार जोड़ी राखी के, बाँधन को मगवाऊँ।

हँसकर बापू बोले! बिटिया, सब सामग्री लाऊँ,
पर बेटी चौ जोड़ी राखी, समझ नहीं मैं पाऊँ,
एक ही भैया हैं तुम्हारे, भुज भी दो रखते हैं,
पर राखी के बंधन भी तो, एक हस्त सजते हैं।

बेटी बोली! चौ जोड़ी भी, मुझको कम पड़ते हैं,
इक जोड़ी मुरलीधर को इक, गणपति को लगते हैं,
बाकी जोड़ी से इक जोड़ी, भैया पर शुभती है,
शेष जोड़ियों में से मुझको, फिर सारी लुभती हैं।

सुन बिटिया की बात मनोरम, बापु मुदित होते हैं,
कंठ कुंठित और नयनों से, अश्रु उदित होते हैं,
जा कर हाट नहीं चौ जोड़ी, सौ ले कर आते हैं,
सँग ही कंगन वस्त्र पैजनी, मन मोहक लाते हैं।

°साधक°

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🌿 ओ३म् 🌿

🙏जय माँ शारदे🙏

दोहा छन्द का विधान

🙏नमन प्रिय मित्रों और लेखन अनुरागियों🙏

🙏माँ वीणापाणी को सादर नमन🙏

आज दोहे की चंद पंक्तियों से सादर आनंदित होइये और आशीष उपहारिये।

एक  दीप  त्यौहार  का,  करे  अनंत  प्रकाश।
सृष्टि सृजन भौ ऐहि विधि, केहू न हो निराश।।

इत्र तुल्य इज्जत यहाँ, छण भर का महमान।
दुर्गुनता निज हस्त ही, निज हस्तहि सम्मान।।

खाली पेट न  चल  सके, हष्ट  पुष्ट  धनवान।
पगि से गज फुट मापते, दीन दरिद्र किसान।।

विषय  चिंतन चित्त धरे, धरे  सगुण  सत काज।
लइ जाय सुखद छावनी, दइ जाय पनस साज।।

राम  नाम  नित  मैं  जपुं,  पाने  को  उद्धार।
यहि जीवन का मूल है, यहि जीवन आधार।।

योग करत निरोग  सदा, सदा  करत  हित काज।
इहि जस तेजस दायिनी, तन मन सुधि सबसाज।।

विघ्नहर्ता विनायका, प्रभु गणाधिप गणेश।
जय जय जय गणनायका, प्रथम पूज्य विघ्नेश।।

हे गणपति उद्धारिये, मैं बालक नादान।
बिन आप के अशीष के, मैं जग में अंजान।।

बहुत दिनों के बाद ही, आई ये बरसात।
जीवन भर सूखा पड़ा, आज कटेगी रात।।

काव्य लेखन काम मिरा, यहि जीवन का अंग।
इस के बिन मैं कुछ नहीं, कोई करे न तंग।।

असली मालिक देश के, अब तक हैं बदहाल।
देश लूट के खा गए, नेता और दलाल।।

रिमझिम करता देश में, घूमे फिरे बसंत।
कुछ दिन का महमान ये, है फिर इसका अंत।।

नारी का सम्मान हो, तभी जगत उद्धार।
वहि जग पालनकरणि हैं, वहि जग का आधार।।

है जग में सबसे बुरा, पारंपरिक दहेज।
सब मन में लालच धरे, कौ न करे परहेज।।

कोरोना है खा गया, हम सबका सुख चैन।
ना बीते प्रभात यहाँ, ना ही बीते रैन।।

 बसते हैं हर कुंज में, मेरे प्रभु श्री राम।
 साँझ सवेरे मैं जपूं, बस उनका ही नाम।।

शब्द वन्दना नित्य ही, देता मुझे अशीष।
हे विप्र सब के समक्ष, झुका रहा मैं शीश।।

निदिया मोसे कह रही, सो जाओ अब बाल।
नहीं तो आ कर मइया, गाल करेंगी लाल।।

°साधक°

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🌿जय माँ शारदे🌿

बढ़े चलो

🙏नमन लेखन अनुरागियों 🙏

🙏माँ वीणापाणी को सादर नमन 🙏

छवि श्रेय: साधक

चले  चलो  बढ़े  चलो,  कभी  कहीं  रुको  नहीं,
न काल से  न चाल  से, कभी  कहीं  झुको  नहीं।
रुको  नहीं  सफर  तलक, बढ़े चलो फलक तलक,
यही ललक रखो सदा, महक तलक चमक तलक।।

°साधक°

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🌿जय माँ शारदे🌿

जय हनुमंते नमः

आप सभी साहित्य अनुरागियों को स्नेहिल नमन 🙏🙏

छवि श्रेय: साधक

कहै पवनसुत करि कै विनती,
धरौ   अशीष  भक्त  के  काँध।
मंज़िल   दूर   अभी   रघुराई,
कटि जइहिं पगि से कई साँझ।।

लै  जइहीं  हम  स्वामी  दौ के,
वायु   मार्ग  से   भ्रात  निवास।
भयौ चकित चित्त सुमित्रा नंद,
सुनि  के  हनुमत  ऐहि उवाच।।

कैसे  दौ  जन  जा  सकते  हैं,
काँध   बैठ   हो  के  आकाश।
बोले   महावीर   लै   सकुँ  मैं,
अनंत  अकार  एकहि  स्वास।।

दोऊ  बाहु   अंजनी   सुत  ने,
दिये   रघुवर   समक्ष   फैलाय।
देख अलौकिक माया प्रभु की,
राम लक्ष्मण  प्रफुल्ल   पुराय।।

बिठा   कांधे   दशरथ   दुलारे,
जपति नाम जय जय श्री राम।
उड़ चले  हनुमत  छोड़ भू कौ,
देन काज अतुलित अभिराम।।

नहीं कौ वीर तुम  सा जग मै,
कहते  मनोज्ञ   कृपा  निधान।
तुम ही हो अतुल्य भक्त  मेरे,
तुम  भी   मेरे   भ्रात  समान।।

°साधक°

जय माँ शारदे 🙏

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